कुण्डलिया

सर में जिसके बाल हो,कंघी मारे रोज।
मन में खुशहाली रहे,तन में उनके ओज।।
तन में उनके ओज,बाल को देख सँवारे।
सर में डाले तेल,शान भी ज्यादा मारे।।
समय रहे मध्यान्ह,रहे मानव जो घर में।
फेरे अपना हाथ,रात हो या दिन सर में।।
राजकिशोर धिरही

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